शनिवार, 25 जुलाई 2020

मेरी पहचान ........

पिछ्ले कुछ दिनों से मेरे मन में एक प्रश्न उठ रहा है कि आखिर मेरा वजूद क्या है ; क्या है मेरी पहचान? क्या मेरे पति के नाम से मेरी पहचान है या अपने बच्चे की माँ होना मेरी पहचान है?
क्या स्त्री का काम केवल घर सँभालना और बच्चों को पालना ही है। यदि हाँ तो फिर विवाह क्या है? - एक बंधन जो एक औरत से उसकी आज़ादी छीन लेता है; जो उनसे उनकी पहचान छीन लेता है और उनके वजूद की लड़ाई है।
मेरा प्रश्न सभी से है - सभी स्त्रियों और पुरुषों से कि यदि शादी का मतलब केवल घर सम्भालना, बच्चों को पालना, ससुराल वालों की सेवा करना या उनके रिश्तेदारों की आवभगत करना ही है तो इसके लिए शादी करना क्यों ज़रूरी है? यह काम तो बिना शादी के भी किया जा सकता  है। नहीं आप मुझे गलत मत समझियेगा।  मैं ये नहीं कह रही हूँ कि आप कोई गलत काम कीजिये। आप किसी भी अनाथ बच्चे को गोद ले कर उसका पालन पोषण कर सकती हैं ,उसे पढ़ा लिखा कर कामयाब बना सकती हैं; अपने लिए एक घर भी ले सकती हैं; उस घर को अपने तरीके से सजा सकती हैं; किसी वृद्धाश्रम में जा कर बुजुर्गों की सेवा कर सकती हैं। फिर क्यों उसे शादी जैसे बंधन में बंध कर अपने वजूद के साथ समझौता करना होता है?
शादी - एक ऐसा बंधन जहाँ औरत की पहचान उसके पति के नाम से होती है; जहाँ उसे उसके बच्चों की माँ के नाम से जाना जाता है; जहाँ उसे जाना जाता है उस परिवार के नाम से जिसके लिए वह आज भी दुसरे परिवार से आई हुई मानी जाती है। उसकी अपनी कोई पहचान नहीं है। अपनी ज़िन्दगी के कई अनमोल पल उस परिवार को देने के बाद आज भी वह अपनापन ढूंढ़ती है; और ढूंढ़ती हैं प्यार के दो बोल, माँ का आँचल ,पिता के प्यार की छाँव , बहन की हंसी ठिठोली, भाई की सुरक्षा और पति में एक दोस्त का साथ। पर उसे मिलता है केवल परायापन। अपने घर-परिवार, माता-पिता, भाई- बहन, संगी-साथियों को पीछे छोड़ आँखों में नए सपने सजाये एक लड़की ससुराल में कदम रखती है। अपना सब कुछ उस परिवार पर न्योच्छावर कर देने का प्रण ले कर अपने नए जीवन की शुरुआत करती है। उसे नहीं पता कि आगे उसका क्या होगा; क्या कोई उसके काम की तारीफ़ करेगा , क्या कोई उसकी परेशानी को समझेगा, क्या बिना कुछ कहे कोई माँ की तरह उसकी तकलीफ को समझ पायेगा या पिता की तरह उसकी ज़रुरत का एहसास कर पायेगा या क्या कोई बहन होगी जो उसकी राज़दार बनेगी? या मिलेगा कोई दोस्त जिसके  वह खुल कर हंस बोल सकेगी? नहीं ऐसा कुछ नहीं होता; उसे मिलती है तो ढेर सारी ज़िम्मेदारी, कर्कश ताने, नफरत व् कड़वाहट। और वह उम्र भर अपने होने का एहसास ढूंढ़ती रहती है, ढूंढ़ती है अपनी पहचान अपना वजूद!
तो अब आप बताइये कि क्या ये शादी की बंधन बहुत ज़रूरी है इस जीवन को जीने के लिए? क्या ज़रूरी है कि अपनी पहचान खो कर, अपने सपनो का गला घोंट कर हम इस बंधन को निभाएं। और उम्र भर दूसरों की पहचान में खुद की पहचान ढूँढ़ते रहें।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें